देहरादून,। अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को नई शैक्षणिक व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में सरकार तेजी से काम कर रही है। खासतौर पर मदरसा बोर्ड के भंग होने के बाद अब राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौंती प्रदेशभर के मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को एक समान नियमों के दायरे में लाना है। यही वजह है कि अल्पसंख्यक कल्याण विभाग अब नई व्यवस्था को अंतिम रूप देने में जुट गया है।
दरअसल, पिछले कुछ समय में प्रदेशभर के कई मदरसों में अनियमितताओं के मामले सामने आए हैं। कहीं बिना मानकों के संस्थान चलने की शिकायत मिली तो कहीं छात्र संख्या में गड़बड़ी के आरोप लगे। इसके अलावा सरकार की ओर से मिलने वाली आर्थिक सहायता के उपयोग को लेकर भी सवाल उठे। इन मामलों के सामने आने के बाद सरकार ने साफ संकेत दिए हैं कि अब अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के संचालन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाएगी।धामी सरकार ने मदरसा बोर्ड को भंग करने के बाद नई व्यवस्था तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की थी। इसी कड़ी में अब अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के गठन पर काम चल रहा है। सरकार का दावा है कि इस प्राधिकरण के जरिए प्रदेशभर के अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को एक व्यवस्थित ढांचे में लाया जाएगा।
हालांकि इसके लिए विभाग के पास समय काफी कम बचा हुआ है, क्योंकि जुलाई महीने से नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी की जा रही है।अल्पसंख्यक कल्याण विभाग फिलहाल दो बड़े मुद्दों पर काम कर रहा है। पहला धार्मिक शिक्षा का नया सिलेबस तैयार करना और दूसरा अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के स्वरूप और रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया से जुड़े नियमों को अंतिम रूप देना। विभाग की कोशिश है कि मई महीने के भीतर इन दोनों कामों को पूरा कर लिया जाए ताकि जून महीने से प्रदेशभर के मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों का रजिस्ट्रेशन शुरू कराया जा सके।
बताया जा रहा है कि धार्मिक शिक्षा के सिलेबस में केवल धार्मिक विषयों को ही शामिल नहीं किया जाएगा, बल्कि छात्रों को उत्तराखंड के इतिहास, संस्कृति और विरासत की जानकारी भी दी जाएगी। सरकार का मानना है कि इससे अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र अपनी धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ सकेंगे। सरकार पहले भी यह स्पष्ट कर चुकी है कि उसका उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ना है। नई व्यवस्था के तहत धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक विषयों और मुख्यधारा की शिक्षा को भी महत्व दिया जाएगा। माना जा रहा है कि प्राधिकरण बनने के बाद संस्थानों में पढ़ाई, शिक्षकों की नियुक्ति, छात्र संख्या और आर्थिक व्यवस्था जैसे मुद्दों पर भी स्पष्ट नियम लागू किए जाएंगे।
नई व्यवस्था को लेकर विभाग लगातार संबंधित संस्थाओं और संगठनों के साथ बैठकें भी कर रहा है। इन बैठकों में सुझाव लिए जा रहे हैं ताकि नियमों को व्यवहारिक और प्रभावी बनाया जा सके। हालांकि सबसे ज्यादा असमंजस मदरसों को लेकर ही देखने को मिल रहा है। कई संस्थानों की ओर से नई व्यवस्था पर सवाल उठाए जा रहे हैं और कुछ आपत्तियां भी सामने आई हैं। दरअसल लंबे समय से कई मदरसे पारंपरिक ढांचे में संचालित हो रहे हैं। ऐसे में अब उन्हें नए नियमों, रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया और सिलेबस के अनुरूप ढालना आसान नहीं माना जा रहा।
यही वजह है कि सरकार के सामने प्रशासनिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर चुनौतियां मौजूद हैं। इस बीच अल्पसंख्यक विभाग ने साफ कर दिया है कि नियमों को अंतिम रूप मिलने के बाद सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को उन्हीं के अनुरूप काम करना होगा। विभाग का कहना है कि संस्थानों के संचालन में किसी तरह की अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
सरकार का मानना है कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में शिक्षा का स्तर बेहतर होगा और छात्रों को आधुनिक शिक्षा प्रणाली से जोड़ने में मदद मिलेगी। साथ ही संस्थानों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता आएगी और सरकारी सहायता का सही उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा।अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार जून और जुलाई तक नई व्यवस्था को किस तरह लागू करती है और मदरसों सहित अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान इन नियमों को किस रूप में स्वीकार करते हैं। क्योंकि आने वाले समय में यही व्यवस्था प्रदेश में अल्पसंख्यक शिक्षा की दिशा और स्वरूप तय करने वाली है।
