देहरादून,। द्वितीय केदार के नाम से विश्व विख्यात मदमहेश्वर धाम से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर सुरम्य मखमली बुग्यालों के मध्य स्थित पाण्डव सेरा क्षेत्र धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक चेतना, ऐतिहासिक विरासत और अनुपम प्राकृतिक सौन्दर्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। यह स्थल न केवल श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केन्द्र है, बल्कि इतिहास प्रेमियों, शोधकर्ताओं और प्रकृति प्रेमियों के लिए भी एक प्रमुख आकर्षण बनता जा रहा है। मान्यता है कि केदारनाथ में भगवान शिव के दर्शन के पश्चात भू-वैकुण्ठ बद्रीनाथ की यात्रा के दौरान पाण्डवों ने इस क्षेत्र में लम्बे समय तक निवास किया था। जनश्रुतियों के अनुसार, पाण्डवों ने यहाँ उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते हुए धान की रोपाई के लिए सिंचाई गूल (जलधारा) का निर्माण किया, जो आज भी इस क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता और जल प्रबंधन प्रणाली का जीवंत प्रमाण है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार पाण्डव सेरा एक पवित्र तपोभूमि है। कहा जाता है कि पाण्डवों ने यहाँ तप-साधना कर भगवान शिव की आराधना की थी। क्षेत्र में स्थित प्राचीन शिला-स्थल, प्राकृतिक जलस्रोत और देवस्थल आज भी श्रद्धालुओं की गहरी आस्था के केन्द्र बने हुए हैं। विशेष पर्वों एवं धार्मिक अवसरों पर दूर-दराज से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुँचते हैं। देवदार, बांज और बुरांश के घने वन, शांत वातावरण और कल-कल बहते जलस्रोत इस स्थान को आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण बनाते हैं, जिससे यहाँ आने वाला प्रत्येक व्यक्ति एक अलौकिक शांति का अनुभव करता है।
पाण्डव सेरा की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर यहाँ स्थित पाण्डवकालीन सिंचाई गूल है, जो प्राचीन भारतीय जल प्रबंधन प्रणाली का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है। पर्वतीय ढलानों से निकलने वाले जल को खेतों तक पहुंचाने को लेकर पत्थरों और मिट्टी से निर्मित यह गूल आज भी कार्यशील अवस्था में दिखाई देती है। यह न केवल तकनीकी दृष्टि से अद्भुत संरचना है, बल्कि पाण्डवों के हिमालय आगमन और उनके निवास की ऐतिहासिक साक्षी भी है। पाण्डव सेरा क्षेत्र प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर है। चारों ओर फैले हरे-भरे जंगल, हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएँ, स्वच्छ जलधाराएँ, विविध वनस्पतियाँ और जैव विविधता इस क्षेत्र को पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती हैं।
प्रातःकाल उठती धुंध, पक्षियों का मधुर कलरव और शांत वातावरण मन को अद्भुत शांति प्रदान करता है। यह क्षेत्र पर्यावरण पर्यटन (इको-टूरिज्म) की दृष्टि से भी अत्यंत संभावनाशील माना जा रहा है। पाण्डव सेरा एक ऐसा स्थल है जहां आस्था, इतिहास और प्रकृति एक साथ साकार होते हैं। यदि इस क्षेत्र का संरक्षण और विकास संतुलित रूप से किया जाए, तो यह उत्तराखण्ड ही नहीं, बल्कि देश के प्रमुख आध्यात्मिक और पर्यावरणीय पर्यटन स्थलों में अपनी विशिष्ट पहचान बना सकता है। पाण्डव सेरा तक पहुंचने का पैदल मार्ग अत्यंत रमणीय और रोमांचकारी है। मदमहेश्वर धाम से लगभग 20 किलोमीटर लंबा यह ट्रैक घने जंगलों, पर्वतीय पगडंडियों और प्राकृतिक जलस्रोतों से होकर गुजरता है। यात्रा के दौरान बाँज, बुरांश और देवदार के वृक्षों की छाया, छोटे-छोटे झरने, पक्षियों की चहचहाहट और हिमालयी दृश्य यात्रियों को एक अविस्मरणीय अनुभव प्रदान करते हैं। हल्की चढ़ाई वाला यह ट्रैक श्रद्धालुओं, पर्यटकों और शोधकर्ताओंकृतीनों के लिए समान रूप से आकर्षक है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाण्डव सेरा क्षेत्र को धार्मिक पर्यटन और पर्यावरण पर्यटन के रूप में सुनियोजित ढंग से विकसित किया जाना चाहिए। साथ ही, पाण्डवकालीन सिंचाई गूल जैसी ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर सरकारी स्तर पर ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। गौण्डार के पूर्व प्रधान भगत सिंह पंवार के अनुसार, “पाण्डव सेरा केवल अतीत की गौरवशाली विरासत का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रकृति, संस्कृति और इतिहास के संरक्षण का जीवंत संदेश भी देता है।”
