जनवक्ता ब्यूरो शिमला
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमन्त्री जय राम ठाकुर ने संजय ठाकुर के उपन्यास ‘सुबह-शाम की धूप’ का विमोचन किया। इस अवसर पर मुख्यमन्त्री ने लेखक के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि यह अद्भुत साहित्यिक कृति साहित्य के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है।जय राम ने कहा कि इसमेंजीवन-संघर्ष और जिजीविषा के द्वन्द्व का सुन्दर चित्रण है।
इस उपन्यास में संजय ठाकुर के कथाकार ने न केवल अपने आसपास के झूठ को अपितु मनुष्य के भीतर निरन्तर घटती-बढ़ती सच और झूठ की द्वन्द्वात्मक दुनिया को प्रामाणिकता, ईमानदारी तथा भाषा की पैनी धार के साथ उजागर किया है। इसके लिए उपन्यासकार ने आत्म-कथात्मक शैली का चयन किया है।
संजय ठाकुर मूलतः शायर हैं। साथ ही पत्रकारिता के साथ भी इनका गहरा रिश्ता रहा है। इनका हिन्दी के अतिरिक्त उर्दू और अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छा अधिकार है। शायरी और पत्रकारिता की दोस्ती की सुन्दर, सृजनात्मक परिणति इस उपन्यास में देखने को मिलती है।
मनुष्य के भीतर की रिक्तता, बेचैनी, तड़प, तनाव,सूखापन, विह्वलता और प्रश्नाकुलता को संजय ठाकुर ने इस उपन्यास में अपने चिरपरिचित अन्दाज़ में बयान किया है। वैसे भी, एक बेहतर रचना मनुष्य के भीतर की रिक्तता को भरने का ही काम करती है।
मध्यवर्गीय मनुष्य के अन्तर्विरोधों की छोटी-बड़ी ख़तूतबदानियों को इस उपन्यास में संजय ठाकुर का कथाकार जिस फिलॉसोफिकल अन्दाज़ और सूत्रधारी औज़ारों के साथ खोलता है उससे उस मनुष्य के जीवन-संघर्ष और जिजीविषा का द्वन्द्व उभरकर सामने आता है। पूरे उपन्यास में संजय ठाकुर सुबह से शाम तक रिश्तों की रज़ाई सिलने में मशगूल हैं। मनुष्य का जीवन तरह-तरह के अन्तर्विरोधों, विसंगतियों, विडम्बनाओं और त्रासदियों से भरा पड़ा है, फिर भी मानवीय सम्बन्धों की रागात्मकता बरकरार है। संजय ठाकुर इस उपन्यास में रागात्मकता की उसी बची हुई फाँक पर अंगुली रखते हैं।

