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सरकार एवं विभाग पहाडी भाषा के उत्थान के प्रति कर रहे चिंतन: नीलम चंदेल

Byjanadmin

Nov 1, 2018

जिला स्तरीय पहाड़ी दिवस पर हुआ कवि सम्मेलन

जनवक्ता डेस्क बिलासपुर
हिमाचल प्रदेश सरकार एवं विभाग भी पहाडी भाषा के उत्थान के प्रति प्रयास एवं चिंतन कर रही है तथा इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए प्रयास कर रहे है। यह बात जिला भाषा अणिकारी नीलम चंदेल ने जिला स्तरीय पहाड़ी दिवस पर उपस्थित साहित्यकारों को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने सभी साहित्यकारांे का आभार व्यक्त करते हुए साहित्यकारों द्वारा पहाडी भाषा में कविताएं वाचन करने के लिए आभार व्यक्त किया तथा पहाड़ी दिवस पर प्रकाश डाला। ज़िला भाषा एवं संस्कृति विभाग कार्यालय बिलासपुर द्वारा यह आयोजन संस्कृति भवन बिलासपुर के बैठक कक्ष में किया गया।

सर्वप्रथम साहित्यकारों ने मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला भाषा अधिकारी नीलम चन्देल ने की तथा मंच का संचालन पीजी कानेज में हिंदी विभाग की प्रभारी प्रों हेमा ठाकुर द्वारा किया गया। सर्वप्रथम प्रकाश चन्द शर्मा द्वारा मां की वंदना प्रस्तुत की गई। आयोजन को दो सत्रों में आयोजित किया गया। प्रथम सत्र में साहित्यकार जीतराम सुमन द्वारा पहाड़ी भाषा पर पत्र वाचन किया गया जिसका विषय रहा – पहाड़ी भाषा का स्वरूप एवं कवियों व साहित्यकारों का पहाड़ी भाषा के प्रति दृष्टिकोण ‘इसके उपरान्त साहित्यकारों द्वारा इस पर चर्चा-परिचर्चा की गई। दूसरे सत्र में कवि सम्मेलन हुआ जिसमें शुरूआत करते हुए साहित्यकार -एस. आर. आजाद ने सौण महीना बड़ी रे डाले, पींगा पईयां। प्रदीप गुप्ता ने ‘‘ धनवानों की लाशों पर तो बेगान भी रोते हैं । रविन्द्र भट्टा ने । हुसैन अली द्वारा ‘‘बोटां पईयां जित्ते नेते, दूर हुईगे मेते-तेते ‘‘। मीना चन्देल ने ‘ किति चली गए से जमाने। सत्या शर्मा ने ‘‘ आसांरे पहाड़ा रा नजारा, सारे जग से न्यारा । सुरेन्द्र मिन्हास ने ‘‘ न्याणे तां जे हुए बुतुए जोगो, तां भेजी दित्ते पढ़ने जो बाहर । जीत राम सुमन ने ‘‘ बैटेमे बछोडे शीर्षक से रचना प्रस्तुत की पंक्तियां थी- रामखला रा टिब्बा से तारले रा गांव। नरैणू राम हितैषी ने ‘ अज इक गल अपने सुफने – री सुनाणी, मुश्बितां च पई थी जिन्द मेरी नमाणी। कविता सिसोदिया ने ‘‘ गर्भा ते कन्या री पुकार । सुशील पुण्डीर ने ‘ अपणी बोल्ली‘ शीर्षक से रचना प्रस्तुत की – पंक्तियां थी- अपणी बोलिया च गलाणे रा मजाई कुछ होर आ।

विपिन चन्देल ने ‘ लोको छैल छबीला बलासपुर म्हारा। अवतार कौण्डल ने ‘गरीब की गरीबी पर कभी मत हंसना। आनन्द सोहर ने ‘ चलदी चाल चलाई रखणी। कविता सिसोदिया की रचना का शीर्षक था- गर्भा ते कन्या री पुकार। ए.आर. सांख्यान ने ‘‘ आई गई रूत ओ सयाले री, लेफां ते रजाईयां, पटुए-दुशाले रीे। प्रकाश चन्द शर्मा ने ‘ मारकण्ड तीर्था जो जाणा गीत सुनाया। बुद्धि सिंह चन्देल ने‘ छड्डी देवा लोको इस नशे वाले टबडे। सोनू देवी ने ‘ बेटी ‘ शीर्षक से रचना प्रस्तुत की। अरूण डोगरा रीतू ने अपनी कविता मेरी सलाह तुसां जो मनणी पौणी में कहा कि मियो मिला जुला करा अपपु बिच पा करा पोहलणियां मारा करा गप्पां नही ंतो मुकी जाणी छोटी जही जिंद इहींयां ही। इसके अतिरिक्त तृप्ता देवी, संतोष कुमारी, हेमा ठाकुर, कौशल्या देवी, रविन्द्र चन्देल, प्रोमिला भारद्वाज व अन्जु शर्मा ने भी अपनी रचनाएं प्रस्तुत की। संगोष्ठी में इन्द्र सिंह चन्देल, कान्ता देवी, प्यारी देवी, अमर सिंह भी श्रोताआंे के रूप मंे उपस्थित रहे।

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