जनता के मेले के रूप में अभी एक सप्ताह और चलेगा नलवाड़ी मेला
जनवक्ता डेस्क, बिलासपुर
अधिकारिक और सरकारी तौर पर ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक सात दिवसीय राज्य स्तरीय नलवाड़ी मेला यद्यपि पिछली संध्या सम्पन्न हो गया ,फिर भी इस नलवाड़ी मेले के अभी तक भी कोई एक सप्ताह तक “ जनता के मेले के रूप में “ निरंतर और चलने की संभावना है | प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि संसदीय चुनावों के कारण चुनाव आचार संहिता लागू हो जाने के कारण जहां एक ओर मेले को अपनी राजनीति का आखाडा बनाने के लिए सत्ताधारी दल के नेता इस मेले के उदघाटन और समापन के अवसर पर विरोध पक्षीय नेताओं की आलोचना ,निंदा करने से वंचित रह गए,किन्तु इस स्थिति का जहां आम आदमी को लाभ रहा ,वहीं ऐसे लोग भी कम नहीं थे जिनहोने इस स्थिति को अतिउत्तम बताते हुए कहा कि मेले व उत्सव और त्योहार तो समाज कि धरोहर हैं तथा ऐसे सांस्कृतिक अवसरों का सत्ताधारी दल द्वारा अपनी राजनीति का आखाडा बनाया जाना एक दम आलोकतांत्रिक व परंपराओ के विरुद्ध है | बड़े बूढ़े लोग कहते हैं कि स्वतन्त्रता से पहले रियासतकाल में अंतिम राजा आनंद चंद निश्चित रूप से हर वर्ष चार चेत्र अथवा अधिकांशतया 17 मार्च को इसका उदघाटन पुराने बिलासपुर नगर के सांडू मैदान में बिलासपुर रियासत व उसके किसानों की समृद्धि व खुशहाली के प्रति खूंटा गाड़ कर उससे बैल को बांध कर उसकी पूजा करके इस मेले का शुभारंभ अवश्य करते थे बल्कि उस समय नगर परिषद की ओर से मुख्यातिथि के रूप में राजा को बिलासपुर की शान पगड़ी सम्मान स्वरूप भेंट की जाती थी और श्री नैना देवी जी से बांस के जंगल से विशेष रूप से लाई व बनाई गई चांदी की मूठ वाली छड़ी प्रजा अथवा आम जनता को सुरक्षा प्रदान करने के प्रतीक स्वरूप भेंट की जाती थी ,क्यूँ कि उस समय राजा को सर्वाधिक अधिकार प्राप्त थे , किन्तु कभी भी राजा ने इस अवसर पर उपस्थित हजारों की संख्या में आए हुए लोगों को संबोधित नहीं किया और न ही इस अवसर का अपनी सत्ता को चमकाने या विरोधियों को डराने-धमकाने का ही कभी कोई प्रयास किया | इस प्रकार सैंकड़ों वर्षों से मेले के चले आ रहे रूप स्वरूप को तथा सांकृतिक व एतिहासिक महत्व को ज्यूं का त्यूं बरकरार रखा | बजुर्ग लोग कहते हैं कि उस समय भी मेले में आने वाले हजारों लोगों के ज्ञान वर्धन के लिए जार्ज विजय हाई स्कूल के विशाल भवन में अत्यंत मनोरंजक व ज्ञान वर्धक प्रदर्शनी लगाई जाती थी ,जिस पर भारी व्यय करके उसे इतना रुचिकर बनाया जाता था कि उसे देखने वाले दंग रह जाते थे | क्यूँ कि उसमें जहां उस समय शिमला की पहाड़ियों से निकलती व दौड़ती हुई रेल गाड़ी सभी को आश्चर्य चकित करती थी,वहीं महान तत्ववेता डार्विन के नियम के अनुसार सृष्टि अथवा पृथ्वी की रचना तथा मानव के अब तक के विकास के इतिहास जैसे गूढ वैज्ञानिक विषय भी बहुत ही सुंदर व सरल उपायों से बड़े बड़े चित्रों के माध्यम से लोगों को समझाये जाते थे | इसके साथ साथ बिलासपुर रियासत ही नहीं बल्कि इन अधिकांश पहाड़ी क्षेत्रों की सभ्यता के हजारों वर्ष पुराने अवशेषों को भी प्रदर्शित किया जाता था | प्रदर्शनियों के स्टाल हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी लगाए गए थे लेकिन उन में किसी भी दर्शक को उत्सुक करने वाला ऐसा कुछ भी नहीं था और घिसी पिटी योजना के नीचे सभी संबन्धित विभागों ने सरकारी ड्यूटी समझ कर कुछ उत्पाद व चार्ट तथा पोस्टर लगा कर केवल मात्र अपना सरकारी उतरदायित्व धक्कियाया | दर्शक कहते है कि इस बार सरस मेले के नाम पर विभिन्न राज्यों द्वारा लगाए गए अपने अपने हस्त शिल्प और उत्पादों तथा भोज्य पदार्थों के स्टालों का लोगों ने निश्चित ही खूब आनंद व लाभ उठाया |कुल मिला कर पहले तीन दिन तक मेला मैदान अधिकाशतया खाली रहा और संलग्न राज्यों व मंडी के शिवरात्रि मेले में ब्यापारियों के व्यस्त होने के कारण नलवाड़ी मेले में वे नहीं पहुँच पाये जबकि मेला चौथे दिन से भरना आरंभ हुआ किन्तु इस बार मेला पहले से काफी फीका ही रहा |

