बिलासपुर प्रेस क्लब में रविवार को आयोजित हुई साहित्यक संगोष्ठी
जनवक्ता डेस्क बिलासपुर
बिलासपुर प्रेस क्लब में रविवार को आयोजित साहित्यक संगोष्ठी में सेवानिवृत जिला लोक संपर्क अधिकारी आनंद सोहर ने बतौर मुख्यतिथि तथा वरिष्ठ साहित्यकार रतन चंद निर्झर ने अध्यक्ष के रूप में शिरकत की। सेवाानिवृत जिला भाषा अधिकारी डा. अनीता शर्मा विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रही। जबकि रविंद्र भटटा ने मंच संचालन किया। सर्व प्रथम दिवंगत रंगकर्मी व सेवानिवृत प्रधानाचार्य प्रेम टेसू के निधन तथा अमृतसर में दशहरा पर्व पर रेल हादसे में मारे गए मृतकों कीे आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि प्रदान की गई। इसके बाद साहित्यकार प्रदीप गुप्ता भारत की शान है बेटियां विषय पर पत्रवाचन किया। राम पाल डोगरा ने पुराने बिलासपुर शहर की यादों को ताजा करते हुए कई प्रतिभावान चेहरों की प्रतिभा ब्यान की। प्रतिभा शर्मा ने त्रेतायुग के रावण के मारे जाने की दशहरा परंपरा पर तंज कसते हुए कहा कि क्या पुतला जलाकर सुधर जाएगा जमाना, फिर क्यों है रावण जलाना, नहीं मरेगा सोचने से रावण ,वह शरण में है राम के …., इसके अलावा प्रतिभा ने बिलासपुर की मशहूर लोक नर्तकी गंभरी के बंदला गांव की तारीफ करते हुए पहाड़ी गीत सुनाया .. आज दि ाया ओ बड़ा छैल गंभरिए तेर ा बंदला बिलासपुर सारे दी है शान, तेरा बंदला। शिव पाल गर्ग ने चर ाा टाहली अंगणा च बैठी हसदी रंया, असें पुणियां बनाणी तू कतदी रंया… । कुलदीप चंदेल हाऊं व्यास गुफा रा नालू, मैं सब कुछ देखया डूबदा, ख्रटनाऊ, सनाई, दरईं, सतलूजा देखे तरदे …, सुशील पुंडीर ने सुनी हो गई हर महफिल , अब न आएंगे प्रेम टेसू, सुखराम आजाद ने सांझ ढलती रही, याद आती रही मैं विरह के गीत गाती रही..। ओंकार कपिल ने हुनर सब में होता है, मगर मलाल तब होता है जब किसी का छप जाता है, किसी का छुप जाता है..। हुसैन अली ने पीढियों का श्रंगार होती हैं बेटियां, संसार में संसार होती हैं बेटियां .. , अश्विनी सुहिल ने बेटियां भी इंसान होती हैं..। विनय शंकर ने अब के हिंदुस्तान में कोई नेता नहीं रहा…। डा. जय नारायण कश्यप ने दरबार शेर का , ग्वाही गधे की तथा पहाड़ी कविता जे मिनणे लगे ता संसार सारा मिणेता , ते गिनणे लगे ता अंबर गिणेता ..। डा. अनिता शर्मा ने मैं गाती रही शोक गीत, लोग जीवन का जश्र मनाते रहे तथा कर्म करो कि जमाना तु हारा है.., रविंद्र भटटा ने जब बागवान ही बागीचे को खाने लगे , तो बागीचे का क्या हस्र होगा..। रतन चंद निर्झर ने सफर में थक कर सर ढूंढ ही लेता है कंधा, चाहे वह अपना हो दूसरे का,सर कभी नहीं देखता जात धर्म या बात..। मु यतिथि आनंद सोहर ने अमेरिका ते मी टू आया, मेरे मुल्के डेरा पाया, अखबारे भी चकण दिती , न्यूज चौनलें खूब चमकाया ..। गोष्ठी के अध्यक्ष रतन चंद निर्झर ने कहा कि अच्छी कविता की रचना के लिए वर्षो प्रतिक्षा करनी पड़ती है। आज की गोष्ठी में कविता के विभिन्न रंग देखने को मिले। अच्छा लगा। वहीं मु यतिथि आनंद सोहर ने कहा कि गोङ्क्षवंद सागर झील में डूबा बिलासपुर गौरवमयी संस्कृति का गढ़ था। उसको लेकर कभी उन्होंने लिखा था कि अपना अपना माल समेटा, घर का सब जंजाल समेटा, पर मंदिर लाना भूल गए।

